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रोज़गार के घटते मौके और मशीनीकरण

अवध पीपल्स फोरम, उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद (अब अयोध्या) में स्थानीय युवाओं के साथ शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना, रोज़गार और स्वास्थ्य जैसे कई मुद्दों आर काम कर रहा एक संगठन है। ‘मशीनीकरण और बेरोज़गारी’ के विषय पर आयोजित चर्चा के दौरान युवाओं ने इस पर आपने विचार व्यक्त किए। उन्हें इस पोस्ट में संकलित किया गया है।

मो. नसीम:

आज से 13-14 साल पहले जब मैं इलाहाबाद में रहता था तो वहाँ हर जगह गन्ना चील का जूस निकाला जाता था। एक ठेले पर कम से कम 2 लोग इस काम को किया करते थे। एक गन्ना छीलने वाला होता था और एक हाथ की मेहनत से मशीनों के माध्यम से जूस निकलता था और जूस ज्यादा भी नहीं निकलता था। फिर मैं 10-12 साल पहले सुल्तानपुर आया तो देखा कि हर कोई बिना छीले ही गन्ने का जूस निकाल रहा है। फिर 4-5 साल बाद मशीनों से जूस निकलने लगा। इससे आमतौर पर एक ही व्यक्ति सारा काम कर लेता है। 

मैंने कुछ दिनों पहले ही एक नई मशीन देखी, उसमें गन्ना अपने आप पेर दिया जाता है। मैंने उस मशीन का इस्तेमाल कर जूस निकालने वाले से बात की तो पता चला कि वह मशीन डेढ़ लाख की है। फिर मैंने सोचा कि हो सकता है इस गन्ना जूस के स्टाल को कोई कंपनी चला रही हो, एक गरीब आदमी डेढ़ लाख की मशीन कैसे खरीद पाएगा! मुमकिन है कि आगे चलकर इस तरह की मशीनों के कारण गन्ना रस निकालने का सारा कारोबार एक ही आदमी के पास चला जाए। इस एक काम से यह समझा जा सकता है कि हमने मेहनत को छोड़ मशीनों को अपनाया है। इससे, ‘हर हाथ को काम’ वाली बात पीछे छूट जाती है। मुझे नहीं लगता है कि हम अब मशीनों के बगैर ज़िंदगी के बारे में सोच पाएंगे। लेकिन ‘हर हाथ को काम’ के बारे में तो सभी को सोचना ही होगा, इससे बचा नहीं जा सकता है। 

Author

  • मो नसीम शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं। बच्चों को पढ़ना और नवीन तकनीक से सीखना-सिखाना इनको बहुत पसंद हैं। जनपद सुल्तानपुर के रहने वाले हैं। शिक्षक के साथ-साथ यह बहुत अच्छे पेंटर-आर्टिस्ट भी हैं। एक सामाजिक शैक्षणिक कार्यकर्ता के तौर पर अपने समुदाय में पहचाने जाते हैं।

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