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खेती, मज़दूरी, पलायन और ग्रामीण जीवन के बदलते अनुभव: लोध गाँव की बदलती कहानी

पारस लोधियाल:

मैं उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले के रामगढ़ क्षेत्र के लोध गाँव का रहने वाला हूँ। हमारा इलाका खुबानी, आड़ू, प्लम, सेब और नाशपाती के बगीचों के लिए जाना जाता है। बचपन की मेरी सबसे खूबसूरत यादों में से एक है फलों के मौसम में पूरे गाँव का एक साथ मिलकर काम करना। बगीचों में लोगों की आवाज़ें गूँजती थीं, बच्चे पेड़ों के नीचे खेलते थे और हर घर में ताज़े फलों की खुशबू बसी रहती थी।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मैंने अपने गाँव को बदलते हुए देखा है। यह बदलाव केवल लोगों के जीवन में नहीं, बल्कि मौसम के स्वभाव में भी आया है।

मेरे बुज़ुर्ग बताते हैं कि पहले हमारे क्षेत्र में सर्दियों के दौरान अच्छी बर्फबारी होती थी। बर्फ पेड़ों के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती थी और अगली फसल भी अच्छी होती थी। लेकिन अब बर्फ बहुत कम पड़ती है। उसकी जगह अचानक बादल फटना, ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश जैसी घटनाएँ बढ़ गई हैं। कई बार फलों की तुड़ाई से कुछ दिन पहले ही ओलावृष्टि पूरी फसल नष्ट कर देती है। किसान पूरे साल मेहनत करता है, लेकिन कुछ ही मिनटों में उसकी सालभर की कमाई खत्म हो जाती है।

आज जलवायु परिवर्तन हमारे लिए केवल टीवी या अख़बारों की खबर नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुका है।

हमारे किसानों के सामने दूसरी बड़ी चुनौती बाज़ार की है। किसान महीनों तक अपने बगीचों की देखभाल करता है। दवाइयों, खाद, मज़दूरी और परिवहन पर भारी खर्च करता है, लेकिन जब उसके फल मंडी तक पहुँचते हैं तो उन्हें उचित मूल्य नहीं मिलता। सबसे अधिक लाभ बिचौलिये कमा लेते हैं। जिस सेब या आड़ू को किसान कम दाम पर बेचता है, वही शहरों में कई गुना अधिक कीमत पर बिकता है। मेहनत किसान की होती है, लेकिन उसका पूरा लाभ अक्सर किसी और को मिल जाता है।

आज पहाड़ों में पर्यटन भी तेज़ी से बढ़ रहा है। एक ओर इससे लोगों को होमस्टे, होटल, टैक्सी और छोटे-छोटे व्यवसायों के माध्यम से रोज़गार मिला है, जो एक सकारात्मक बदलाव है। लेकिन दूसरी ओर इसका असर खेती पर भी दिखाई देने लगा है। कई लोग अब बगीचों और खेतों की जगह होटल और रिसॉर्ट बनाना अधिक लाभदायक समझने लगे हैं। युवा भी सालभर खेती में मेहनत करने की बजाय पर्यटन से जुड़े कार्यों को अधिक सुरक्षित और तुरंत आय देने वाला विकल्प मानते हैं।

इस बदलाव ने हमारे पहाड़ों के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है-यदि धीरे-धीरे बगीचे कंक्रीट की इमारतों में बदल गए, तो हमारी पहचान क्या बचेगी? क्या उत्तराखंड केवल घूमने की जगह बनकर रह जाएगा, या फिर उसके फलों के बगीचे, खेती और पहाड़ी संस्कृति भी उसकी पहचान का अभिन्न हिस्सा बने रहेंगे?

मेरा मानना है कि पर्यटन और खेती एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि दोनों को समझदारी से जोड़ा जाए, तो हमारे बगीचे ही हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं। आज दुनिया भर से लोग केवल इसलिए पहाड़ों की ओर आते हैं ताकि वे सेब के बगीचों में घूम सकें, पेड़ों से फल तोड़ने का अनुभव प्राप्त कर सकें और पहाड़ी जीवन को करीब से महसूस कर सकें। यदि इस दिशा में योजनाबद्ध ढंग से काम किया जाए, तो पर्यटन भी बढ़ेगा और खेती भी सुरक्षित रहेगी।

पहाड़ की असली पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता नहीं, बल्कि उसके खेत, बगीचे और वे किसान हैं, जो हर कठिनाई के बावजूद अपनी मिट्टी से रिश्ता नहीं तोड़ते। शायद यही कारण है कि आज हमारे गाँव के अनेक युवा खेती को अपना भविष्य नहीं मानते। वे देखते हैं कि उनके माता-पिता दिन-रात मेहनत करने के बावजूद आर्थिक रूप से सुरक्षित जीवन नहीं जी पा रहे हैं। इसलिए वे रोज़गार की तलाश में हल्द्वानी, देहरादून, दिल्ली और अन्य शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं। यह केवल पलायन नहीं, बल्कि परिस्थितियों से मजबूर होकर लिया गया निर्णय है।

जब युवा गाँव छोड़ते हैं, तो केवल खेत और बगीचे ही खाली नहीं होते, बल्कि गाँव की पहचान, संस्कृति और सामुदायिक जीवन भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। पहले फलों के मौसम में पूरा गाँव एक परिवार की तरह दिखाई देता था। आज कई घर सालभर बंद रहते हैं और बुज़ुर्ग अकेले अपने बगीचों की देखभाल करते नज़र आते हैं।

फिर भी मुझे विश्वास है कि उम्मीद अभी बाकी है। यदि उत्तराखंड के किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिले, बिचौलियों पर निर्भरता कम हो, कोल्ड स्टोरेज और फल प्रसंस्करण जैसी सुविधाएँ विकसित हों तथा बदलते जलवायु संकट से निपटने के लिए सरकार और समाज मिलकर काम करें, तो युवा एक बार फिर खेती की ओर लौट सकते हैं।

मेरे लिए लोध केवल एक गाँव नहीं, बल्कि मेरी पहचान है। मैं चाहता हूँ कि आने वाली पीढ़ियाँ भी हमारे बगीचों में खिलते सेब और आड़ू के फूल देखें, बर्फ से ढके पहाड़ों का अनुभव करें और खेती को मजबूरी नहीं, बल्कि गर्व के साथ अपनाएँ।

आज सवाल केवल इतना नहीं है कि किसान खेती क्यों छोड़ रहा है। असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसी परिस्थितियाँ बना पा रहे हैं, जहाँ खेती करने वाला व्यक्ति सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के साथ अपना भविष्य देख सके? यदि इसका उत्तर ‘नहीं’ है, तो पलायन केवल गाँवों का नहीं होगा, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारी खेती और हमारे पहाड़ों का भी होगा।

Author

  • पारस लोधियाल उत्तराखंड से हैं। उन्हें सामाजिक, पर्यावरणीय और जनसरोकार के मुद्दों में रुचि है। वे अपने अनुभवों और विचारों के माध्यम से समाज, युवाओं और पहाड़ से जुड़े विषयों पर लिखते हैं।

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