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समान स्कूल व्यवस्था लागू होना – समय की ज़रूरत 

छोटू सिंह रावत:

हमारे देश में दो तरह के स्कूल है- सरकारी स्कूल और प्राइवेट स्कूल। सरकारी स्कूल में गरीब व मध्यम परिवार के बच्चें पढ़ने के लिए जाते हैं और प्राइवेट स्कूल में अधिकारी, नेता, मंत्री, व सक्षम परिवार के बच्चे पढ़ते हैं। 

आज से 30 साल पहले की बात करें तो प्राइवेट स्कूल केवल शहरों में दिखाई देते थे, लेकिन आज गाँव-गाँव और शहर-शहर हर एक जगह पर निजी स्कूलोंं ने कब्ज़ा कर लिया है।

इसका सबसे बड़ा कारण है सरकारी स्कूल फेल होने लग गए, इसलिए प्राइवेट स्कूलोंं की संख्या बढ़ने लगी है। अब तो देखा जाता है कि मध्यम वर्ग के लोग भी अपने बच्चोंं को प्राइवेट स्कूलोंं में दाखिला करवा रहे हैं।

सरकारी स्कूल केवल गरीब, दलित, और आदिवासी बच्चोंं के लिए रह गए हैं और आज इन स्कूलों की स्थिति और खराब होती जा रही है। 6 से 10 साल के बच्चोंं का शिक्षा का स्तर प्राइमेरी स्कूल में बढ़ना चाहिए। लेकिन प्राइमरी स्कूलों की हालत इतनी खराब है कि आज प्राइमरी कक्षा के बच्चोंं को ठीक से पढ़ना-लिखना भी नहीं आता है और इन बच्चों का जिस उम्र में मानसिक-बौद्धिक विकास में वृध्दि बढ़नी चाहिए, लेकिन आज गाँवों में प्राथमिक स्कूलों की स्थिति ऐसी है कि बच्चों को ठीक से माहौल नहीं मिल पाता है जिसके कारण बच्चे कुछ सीख भी नहीं पाते हैं। 

हम सभी जानते हैं कि हमारे देश के अलग-अलग राज्यों से श्रमिक ईंट-भट्टों, गन्ना कटाई, फैक्टरियों व दिहाड़ी निमार्ण मज़दूर जैसे कार्यों के लिए लाखों की संख्या में दलित और आदिवासी समुदाय के लोग परिवार सहित प्रवास करते हैं। इन परिवारों के साथ प्रवास करने वाले बच्चोंं की संख्या भी काफ़ी बड़ी है, लगभग लाखों में। परिवार के साथ अलग-अलग राज्यों में रोज़गार के लिए पलायन करने वाले बच्चे अधिकतर शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। 

केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें और गैर सरकारी संस्थाएं, शिक्षा की स्थिति में सुधार लाने के लिए कई सालों से प्रयासरत हैं। इसके लिए तरह-तरह की योजनाएं व अलग-अलग तरह के माॅडल स्कूल भी बनाए गए हैं। 

देश के सभी बच्चें पढ़-लिख जाएं, इसके लिए 6 से 14 साल के बच्चोंं के लिए अनिवार्य शिक्षा भी लागू है। शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए 15 वर्ष बीत गए हैं फिर भी आज हम देखते हैं कि देशभर में प्रवास होने वाले परिवारो की संख्या लाखों में है और इन परिवारों के साथ उनके बच्चे भी आते-जाते रहते हैं, जिसके चलते वो कहीं भी शिक्षा के लिए दाखिला नहीं ले पाते और से शिक्षा से वंचित रहते हैं।

आज ज़रूरी सवाल है इन प्रवासी बच्चोंं का। जहाँ पर सरकार शिक्षा की स्थिति को सुधारने के लिए अलग-अलग योजनाओं में करोड़ों रूपये खर्च कर रही है, फिर भी एक बड़ी संख्या में प्रवासी बच्चे शिक्षा से कोसों दूर हैं और सरकारी स्कूलों की हालात जस की तस ही है। प्रवासी बच्चे शिक्षा से जुड़े रहे इसके लिए सरकार ने जगह-जगह होस्टल, छात्रावास भी खोले हैं, फिर भी माता-पिता इन बच्चोंं को हॉस्टल व छात्रावास में नहीं छोडते हैं। इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि इन छात्रावासन में सुविधाओं का आभाव है या फिर भी माता-पिता को विश्वास नहीं है। 

आज भी कई जगह सरकारी स्कूलों में हम देखते हैं कि बच्चोंं के लिए खेल मैदान, पर्याप्त टीचर, विषयवार टीचर, कम्प्यूटर क्लास, लाइब्रेरी, कमरें व अन्य सुविधाएं नहीं हैं जिनसे बच्चोंं का शिक्षा का स्तर समय पर नहीं बढ़ पाता है। 

सरकारी स्कूलों में सुविधाएं नहीं होने और पढ़ाई ठीक से नहीं होने के कारण माता-पिता का भी भरोसा इन स्कूलों से उठता जा रहा है। जिसके कारण प्राइवेट स्कूलों में नामांकन बढ़ रहा है और हरेक जगह पर प्राइवेट स्कूलों का कब्जा बढ़ने लग गया है।

अगर शिक्षा की स्थिति को सुधारना है तो सरकार को ऐसा कानून लागू करना होगा जहाँ चाहे कोई भी अधिकारी हो, सरकारी नोकरी में हो, या फिर नेता या मंत्री हो, सभी के बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ना होगा। सभी के लिए शिक्षा एक समान होगी, तभी देश में शिक्षा की स्थिति और सरकारी स्कूलों में सुधार आ सकता है।

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  • छोटू सिंह, राजस्थान के अजमेर से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वे असंगठित श्रमिक और बच्चों के साथ ज़मीनी स्तर के मुद्दों पर कार्यरत हैं और वर्तमान में सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं।

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