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मानसिक स्वास्थ्य पर अयोध्या की किशोरियों से मेरी बात-चीत

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गरिमा मिश्रा:

मेरा नाम गरिमा मिश्रा है, मैं निराला नगर अयोध्या की निवासी हूँ। मैंने अवध यूनिवर्सिटी से अप्लाइड साइकोलॉजी में एम.ए. की पढ़ाई पूरी की है। मुझे पुस्तकें पढ़ना बहुत पसंद है, साथ ही लोगों से बात करना और उनके मनोभाव को जानना भी पसंद करती हूं। उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद (बदला हुआ नाम अयोध्या) क्षेत्र में कार्य कर रहे “अवध पीपुल्स फोरम” में 3 महीने से इंटर्नशिप कर रही हूँ।

अवध पीपुल्स फोरम की जानकारी मुझे अपने एक मित्र से मिली थी। जब मैं अवध पीपुल्स फोरम में पहले दिन पहुंची तब वहाँ सबसे पहले मुमेरी लाकात जागृति दी और आरजू दी से हुई थी। उन्होंने ही अवध पीपुल्स फोरम के काम के बारे में बताया। कुछ देर बाद मेरी मुलाकात आफाक भाई और गुफरान भाई से हुई। उन्होंने मेरी पढ़ाई के बारे में पूछा और साथ ही पूछा कि क्या करना चाहोगी। मैं इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ थी कि कोई भी संस्था किस तरह से कार्य करती है। वहाँ पर आफाक भाई ने पूछा कि आप कितने दिन का कार्य करने के लिए कमिटमेंट ले रही है, इसके बाद 3 महीने के कार्य के लिए कमिटमेंट हुआ था। बातचीत के दौरान ही आफाक भाई ने प्रेरणा किशोरी विकास केंद्र (PKVK) के बारे में बताया था जिसमें उन्होंने मुझे मानसिक स्वास्थ्य के आधार पर कुछ प्रश्नावली PKVK के अंतर्गत जोड़ने का सुझाव दिया। उसे वक्त मैंने ‘हाँ’ कर दिया और जब मैंने अपनी विश्वविद्यालय की अध्यापिका को यह बताया तो उन्होंने मुझे बहुत शाबाशी और आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम्हें बहुत बेहतरीन अवसर मिला है। 2-3 दिन में मैंने प्रश्नों को लिखकर दे दिया और  प्रेरणा किशोरी विकास केंद्र के अंतर्गत प्रश्नावली में जोड़ दिया गया। अवध पीपल्स फोरम से जुड़ने के बाद मैंने बहुत कुछ सीखा जैसे कि साप्ताहिक प्लान बनाना, बिना पैसों के भी किस तरीके से कार्य किया जा सकता है, किस तरीके से अपनी बातें समुदाय के लोगों तक पहुंचाई जाए, टीवी स्क्रीनिंग के माध्यम से महिलाओं में जागरूकता फैलाना, कंप्यूटर प्रशिक्षण आदि।

अवध पीपल्स फोरम के द्वारा एक ‘पुस्तक यात्रा’ की जाता है जिसमें छोटे बच्चों के लिए कहानी की पुस्तकें होती हैं। अलग-अलग कस्बे जैसे : मकबरा, मुरावल टोला, कजरी कुआ, सहादत अली खां की छावनी, 40 क्वार्टर, पहाड़गंज, वजीरगंज, दिलकुशा, मेहदौना में जाकर के बच्चों के लिए ‘पुस्तक यात्रा’ की जाती है। इसमें छोटे-छोटे बच्चे आकर अलग-अलग कहानी की पुस्तकों को पढ़ा करते थे। उन सभी बच्चों के नाम, उनके फोन नंबर, साथ ही वह कौन सी पुस्तक का अध्ययन कर रहे है उसका नाम भी लिखा जाता था। वहाँ पर सभी बच्चे जो भी चीज समझ में नहीं आता वह आकर पूछते थे। पुस्तक यात्रा उस समय की जाती थी जब बच्चों की स्कूल से छुट्टी हो जाती थी और वह बच्चों के मनोरंजन का वक्त होता था। उस वक्त बच्चे खेलते-खेलते पुस्तकों को पढ़ा करते थे।

हर सोमवार को यहाँ मीटिंग की जाती है जिसमें साप्ताहिक प्लान के ऊपर बातचीत की जाती है। इसमें पिछले सप्ताह और अगले आने वाले सप्ताह का वर्णन किया जाता है। साप्ताहिक प्लान में तीन चीज जो मुख्य रूप से हैं वह हैं पर्सनल, प्रोफेशनल और प्रोजेक्ट, जिसे सभी लोग अपने साप्ताहिक प्लान में लिखते हैं। सोमवार की मीटिंग की शुरुआत एक गायन से की जाती है। 3 बजे से सर्वे के लिए मोहल्ले की किशोरियों के पास जाते हैं। इस सर्वे में तो बहुत प्रश्न थे लेकिन मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित 7 प्रश्न थे जिससे किशोरियों के मनोभाव को जानने का प्रयास किया जा रहा था, जिसमे प्रश्न कुछ इस प्रकार थे:

1. क्या किशोरियां पुरुषों के साथ रहने और बातचीत करने में सहज महसूस करती है?

इस प्रश्न के अंतर्गत 48.4% किशोरियों ने पुरुषों से बात करने में सहजता महसूस किया है क्योंकि उनके पारिवारिक परिवेश बेहतर है। यह महिला/किशोरी अपनी बात अपने पिता और भाई से साझा कर पाती हैं। और उन किशोरियों के पिता और भाई का व्यवहार मित्रवत् है। जिसकी वजह से वह बहुत ही सहजता से अपनी बात अपने पिता और भाई से कह पाती हैं।

इस प्रश्न के अंतर्गत 34% किशोरियों ने पुरुषों से बात करने में असहजता महसूस किया क्योंकि ये किशोरियाँ अक्सर अपने घर में रोक-टोक पाती हैं। किसी भी कार्य के लिए घर से बाहर जाने पर रोक, शाम से पहले घर चले आने की बंदिश, धीमे बोलना, कम बोलना आदि जैसी रोक-टोक कहीं ना कहीं उन्हें बाहरी व्यक्तियों से बात करने में असहजता महसूस कराती हैं।

इस प्रश्न के अंतर्गत 17.5% किशोरियों ने ‘पता नहीं’ का जवाब दिया। यानी वह दोनों ही परिस्थितियों में सहज नहीं है‌‌ क्योंकि इनके लिए यह निर्णय लेना कठिन है कि कब या कि तरह के पुरुषों से बात की जा सकती है या किस परिस्थितियों में बात करना उचित नहीं है।

2. क्या किशोरीया सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने में पारिवारिक और सामाजिक रूप से सहजता महसूस करती हैं?

इस प्रश्न के अंतर्गत 26.2% किशोरियों ने सहजता महसूस किया है क्योंकि सोशल मीडिया दुनिया भर के लोगों से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है और इसने विश्व में संचार को नया आयाम दिया है। सोशल मीडिया के साथ ही कई प्रकार के रोज़गार भी पैदा हुए हैं। वर्तमान में आम नागरिकों के बीच जागरूकता फैलाने के लिये सोशल मीडिया का प्रयोग काफी व्यापक स्तर पर किया जा रहा है।

35.3% किशोरियों ने असहजता महसूस किया है क्योंकि सोशल मीडिया पर गोपनीयता की कमी होती है और कई बार आपका निजी डेटा चोरी होने का खतरा रहता है। सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रयोग हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकता है।

इस प्रश्न के अंतर्गत 38.5% किशोरियों ने ‘पता नहीं’ जवाब दिया है क्योंकि सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को नया आयाम दिया है। आज प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी डर के सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचार रख सकता है और उसे हज़ारों लोगों तक पहुँचा सकता है, परंतु सोशल मीडिया के दुरुपयोग ने इसे एक खतरनाक उपकरण के रूप में भी स्थापित कर दिया है तथा इसके विनियमन की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है।

3. क्या किशोरिया स्कूल, मार्केट मोहल्ले में आने-जाने में सहजता महसूस करती है?

इस प्रश्न के अंतर्गत 69.7% किशोरियों ने सहजता महसूस किया है क्योंकि घूमना-फिरना शॉपिंग करना तो हर किसी को पसंद होता है। वर्तमान समय में महिलाएं बाहर घूमने में स्वतंत्रता महसूस करती हैं वह कहीं ना कहीं खुद को एक खुला महसूस करती हैं जहाँ निकलकर वह अपने पसंद की चीज कर पाती है। अधिकांशत: यह देखा जाता है कि जो लड़कियाँ सिर्फ स्कूल से घर आती हैं और फिर कोचिंग जाती हैं। इन सभी में उनका पूरा दिन खत्म हो जाता है। परंतु यह डाटा इसमें बदलाव को स्पष्ट प्रकट कर रहा है।

इस प्रश्न के अंतर्गत 18.7% किशोरियों ने असहज महसूस किया है क्योंकि घर का ऐसा माहौल है कि इन्हें घर से बाहर निकलने नहीं दिया जाता है। उन्हें अक्सर समाज की किसी बुरी घटनाओं का उदाहरण देकर घर में रहने का सुझाव दे दिया जाता है। आज भी हमारे समाज में ऐसे लोग हैं जिनका यह मानता है कि महिलाओं को घर  जाकर भोजन बनाना होता है तो इसके लिए उन्हें बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है। उन्हें जो भी सीखना है घर के अंदर ही रहकर सीखें।

इस प्रश्न के अंतर्गत 11.6% किशोरियों ने ‘पता नहीं’ जवाब दिया है क्योंकि यह संभावना है कि किसी-किसी जगह पर इन्हें जाने में असहजता महसूस होती होगी साथ ही किसी-किसी जगह पर जाने पर इन्हें सहजता महसूस होती है।

4.पढ़ाई, परिवार व अन्य से संबंधित समस्याओं पर सहज महसूस करने के लिए किशोरीया क्या करती हैं?

(a) परिवार से बात (b) मित्रों से बात (c) अकेले में रहना (d) अन्य गतिविधि (जैसे- टीवी देखना, पुस्तक पढ़ना, संगीत, फोन चलानाआदि)।

इस प्रश्न के अंतर्गत 54.5% किशोरियों ने परिवार से बात करने में सहजता महसूस किया है क्योंकि किशोरियों को अपने परिवार में अत्यधिक प्रेम मिलता है जिससे वह अपनी बातें खुलकर के अपने परिवार के सामने प्रकट कर पाती हैं। साथ ही किशोरियाँ अपने माता-पिता का सम्मान करती हैं जिसकी वजह से उन पर उनका विश्वास बना रहता है।

इस प्रश्न के अंतर्गत 19.7% किशोरियों ने मित्र से बात करने में सहजता महसूस किया है क्योंकि इनका ऐसा मानना है कि परिवार से बेहतर उन्हें मित्र समझ सकते हैं। इनका मानना है कि घर पर कहेंगे तो डांट पड़ सकती है परंतु मित्र उन्हें बेहतर समझेगा।

इस प्रश्न के अंतर्गत 11.2% किशोरिया अकेले रहने में सहजता महसूस करती है क्योंकि यह अपनी समस्याओं को दूसरों से समाधान लेने से बेहतर खुद ही उसको हल करना बेहतर मानते हैं। इन्हें इस बात का डर भी होता है कि कोई उनकी बात जानकर उनका मजाक ना उड़ाए, साथ ही उनका फायदा ना उठाया जाए।

इस प्रश्न के अंतर्गत 14.6% किशोरिया अन्य गतिविधि (संगीत, टीवी, पुस्तक पढ़ना, फोन चलाना आदि) करने में सहजता महसूस करती हैं, क्योंकि इनका मानना है कि समस्या से ध्यान हटाने से संभव है कि समस्या का समाधान मिल जाए। बहुत बार ऐसा होता भी है कि किसी चीज को लेकर हम परेशान रहते हैं और पुस्तक  पढ़ने से उसका समाधान मिल जाता है साथ ही संगीत सुनने से शांति मिलती है।

5. मानसिक दबाव किन पर ज्यादा होता है?

(a) लड़का (b) लड़की

इस प्रश्न के अंतर्गत 88.4% किशोरियों को मानसिक दबाव अधिक महसूस होता है क्योंकि उनका मानना है कि उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, करियर के दबाव, और लैंगिक भेदभाव ज्यादा है। विशेषत: ऐसा हो सकता है कि महिलाएं अपने भावनात्मक अनुभवों को अधिक बयां करने की प्रवृत्ति रखती हैं।

इस प्रश्न के अंतर्गत 11.6% किशोरियों ने लड़कों पर मानसिक दबाव ज्यादा पाया है जिसके कारण निम्नवत है-

व्यक्तिगत अनुभव: कुछ महिलाओं के अनुभवों और परिस्थितियों में वे पाती हैं कि पुरुषों पर मानसिक दबाव अधिक होता है।

सामाजिक दबाव: कुछ समाजों में, महिलाओं को समाजिक दबाव, लैंगिक भेदभाव, और अन्य सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जो उन्हें पुरुषों से अधिक मानसिक दबाव महसूस करा सकता है।

जीवन-शैली: कुछ महिलाओं की जीवन-शैली और सामाजिक भूमिकाएं उन्हें पुरुषों की तुलना में अधिक दबाव में डाल सकती हैं।

6. क्या आप अपने नज़दीकी क्षेत्र में किसी मनोचिकित्सक को जानती हैं?

इस प्रश्न के अंतर्गत 22.5% किशोरियाँ ही मनोचिकित्सक को जानती हैं, क्योंकि बहुत सारे लोगों को पता ही नहीं है कि मनोचिकित्सक होते क्या है और इनका कार्य क्या होता है। यह स्पष्ट करता है कि हम मानसिक स्वास्थ्य के प्रति कितने कम जागरूक हैं।

इस प्रश्न के अंतर्गत 77.5% किशोरिया मनोचिकित्सक को नहीं जानती हैं। इसका कारण जागरूकता की कमी हो सकती है। क्योंकि बहुत सारे लोग किसी प्रकार के असामान्य व्यवहार को ठीक करने के लिए झाड़-फूंक की सहायता लेते हैं। अगर कोई किसी को राय देता है मनोचिकित्सक के पास जाने की तो बहुत सारे लोग उसे पागल भी कहते हैं। और अगर व्यक्ति मनोचिकित्सक के पास दिखाने के लिए चला जाता है तो उस पर पागल का एक टैग लगा दिया जाता है।

7. क्या आप किसी मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को जानती हैं?

इस प्रश्न के अंतर्गत 14.7% किशोरियाँ ही मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को जानती हैं, क्योंकि शारीरिक रूप से नजर आने वाले लक्षण तो सभी लोग देखते हैं लेकिन मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के लक्षणों को बहुत कम लोग पहचान पाते हैं।

इस प्रश्न के अंतर्गत 85.3% किशोरियाँ अस्वस्थ व्यक्ति को नहीं जानती हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता है कि अस्वस्थ व्यक्ति के मानसिक स्तर पर क्या लक्षण होते हैं। बहुत सारे लोग यह जानते ही नहीं है कि अत्यधिक क्रोध करना तथा अत्यधिक हँसना दोनों ही एक तरह का मानसिक रोग है।

इन्हीं प्रश्नों को किशोरियों से पूछा गया था। इस सर्वे के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि पहले की अपेक्षा किशोरियों/महिलाओं की स्वतंत्रता में और अपनी बातों को अभिव्यक्त करने के तरीकों में बहुत बदलाव आया है। वह अब खुलकर अपना जीवन जी पा रही हैं। किशोरियाँ अपनी माता से या अपने परिवार में कई बातों को साझा कर पा रही हैं। मानसिक स्वास्थ्य का अध्ययन सिर्फ इसलिए नहीं किया जाता है कि मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों की पहचान करके उन्हें समायोजित एवं और संतुलित व्यक्तियों से अलग रखा जाए बल्कि इसलिए भी किया जाता है कि मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने समायोजन को और भी अधिक उत्तम एवं आदर्श बना सके ताकि उसके व्यवहार को एक मॉडल बनाकर अन्य लोग भी वैसा ही व्यवहार करने के लिए प्रेरित हों। मानसिक स्वास्थ्य से सामाजिक जीवन में उत्तम जागरण आता है और समाज का चौमुखी विकास होता है। जब किसी समाज के अधिकतर युवतियों का मानसिक स्वास्थ्य उत्तम होता है तो उस समाज का मनोबल ऊंचा होता है तथा उसमें संगठनात्मक प्रक्रियाएँ सक्रिय होती हैं। ऐसे ही समाज का भविष्य सुरक्षित रहता है तथा वह कल्याणकारी दिशा में अग्रसर रहता है। समाज को मानसिक रूप से स्वस्थ नेता मिलता है जिनके नेतृत्व में फिर समाज का सर्वांगीण विकास संभव हो पाता है। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य का महत्व व्यक्तित्व विकास में भी काफी महत्वपूर्ण होता है, किसी व्यक्ति का बौद्धिक, शारीरिक एवं संवेगात्मक विकास तभी संभव है जब वह मानसिक रूप से स्वस्थ हो।

Author

  • गरिमा मिश्रा निराला नगर,अयोध्या की निवासी हैं। उन्होंने अपनी पढ़ाई M.A. अप्लाइड साइकोलॉजी में अवध यूनिवर्सिटी से पूरी की है। उन्हें पुस्तक पढ़ना बहुत पसंद है,साथ ही लोगों से बात करना और उनके मनोभाव को जानना भी पसंद हैं । वह 3 महीने से उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद (बदला हुआ नाम अयोध्या) क्षेत्र में कार्य कर रहे "अवध पीपुल्स फोरम" में इंटर्नशिप कर रही हैं।

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