आस्तिकता और नास्तिकता से परे है हमारी संस्कृति

पावनी: एक बार मेरे पापा के दोस्त हमारे घर आए हुए थे। दूर का सफ़र था इसलिए रात को वो हमारे घर ही रुके। उनके

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आजच्या परिस्थितीबद्दल माझं मतं मांडत आहे | आज के हालातों पर मेरे विचार

उमेश ढुमणे: आपल्या देशात संविधान/लोकशाही आहे। डॉ। बाबासाहेबांनी सांगितलं आहे। संविधान कितीही चांगलं असो पण संविधान चालवणारे लोकं जर वाईट असतील तर आज जी परिस्थिती

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सही मज़दूरी और सम्मान के लिए संघर्षरत हैं देश की महिला घरेलू कामगार

श्रुति सोनकर: अक्सर हम देखते है कि महिलाएं घर का सारा काम करने के साथ-साथ दूसरे के घरों में काम करके खुद पैसा भी कमाती

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जाति प्रथा और भेदभाव के खिलाफ़ आवाज़ उठाना – हमारा पहला फ़र्ज़ है

कविता भील: यह तो आप सभी जानते हैं कि जाति क्या है। इस दुनिया में सभी व्यक्तियों की अलग-अलग जातियाँ होती हैं। वैसे तो जातियाँ

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“अफसोस की बात है कि छुआछूत आज भी हो रहा है”: मधु भील

मधु भील: जाति शब्द तो आप सभी जानते हैं। हर समाज – भील, मीणा, मेघवाल, खटीक, हरिजन आदि, जातियों के लोगों को नीचा मानता है।

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कोरोना महामारी के बाद झारखण्ड राज्य में पलायन की महामारी का सम्भावना: एक गंभीर समस्या

अनुज बेसरा: आज़ादी के लगभग 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी अधिकांश भारतीय गाँवों की स्थिति वैसी ही है, जैसी आज़ादी मिलने के समय

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