बचपन के दिन और गाँव के मेले की खट्टी-मीठी यादें

शिवांशु: मेला, हाट, बाज़ार हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा रहे हैं। हम कहीं भी लगने वालों मेलों के ज़रिये वहाँ की संस्कृति, रीति-रिवाज़, सभी चीज़ों

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पढ़ाई कर, परिवार-समाज के लिये कुछ करने का पूनम का संघर्ष

पूनम कुमारी: मैं एक ऐसे परिवार से हूँ जहाँ हर एक चीज बहुत ही मुश्किल से मुकम्मल होती है। एक बार में कुछ मिल जाये

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सहदोय डायरीज़: सहदोय में रहने का अनुभव

सहोदय के बच्चों ने अपने शब्दों और तरीके में अपने अनुभव, भावना, समझ, काम और यहाँ के माहौल के बारे में लिखे। स्कूल में टीचर

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धान कूटते हुए निकली नई सुबह में जीवन की आवाज़- संस्मरण

एलीन: एतवारी लगभग 30 साल की हो गई है। अपने गांव के देस से दूर दिल्ली शहर में एक सामाजिक संस्था के साथ काम करती

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आपको सबसे पहले अपनी जाति के बारे में कब पता चला?

आशीष कुमार, अवध पीपल फॉरम, अयोध्या (फैज़ाबाद) (उत्तर प्रदेश) जब मैं 14 साल की उम्र का था तब मैं अपनी छत पर पतंग उड़ा रहा

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जाति प्रथा और भेदभाव के खिलाफ़ आवाज़ उठाना – हमारा पहला फ़र्ज़ है

कविता भील: यह तो आप सभी जानते हैं कि जाति क्या है। इस दुनिया में सभी व्यक्तियों की अलग-अलग जातियाँ होती हैं। वैसे तो जातियाँ

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