गीत: घरों से निकली हैं लड़कियाँ

युवानिया डेस्क: युवाओं के साथ की एक पहल – सामाजिक परिवर्तन शाला के वार्षिक युवा महोत्सव में जुड़े हिंदी ग्रुप के साथियों ने ये गाना

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ଜୱାଦ ଦେଲା ଚାଷୀ କେ ଦୁଖ୍

रोहित बाग: ସୁନା ରଗେଂ ରଗେଂଇ ହେଇ କେତେ ସୁନ୍ଦର ଦିସୁଥିଲା କ୍ଷେତଦେଖି କରି ଚାଷୀ ଭାଇର ପୁରି ଯାଉଥିଲା ପେଟ୍ଆରୁ କେତେ ଦିନ୍ ଗଲେ ହେଇ ଥୀତା ଧନ୍ କଟାଆରାମ୍ ସେ ଖାଇଥିତା

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पर्यावरण गीत

इस गीत के रचयिता बिहार के गया ज़िले में स्थित सहोदय शिक्षण केंद्र में पढ़ने वाले, 12 वर्षीय, संतोष कुमार हैं। इनके पिता श्री गनौरी

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वीडियो स्टोरी- बाल मेला

शिवजी किराड़े: मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में आधारशिला शिक्षण केंद्र गत बीस वर्षों से आदिवासी बच्चों को खेलों और गतिविधियों के माध्यम से शिक्षा

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ଲଢମା ଆ…. ଲଢମା ଆ

डोलामणी: ତୁଇ ପାଠ୍ ନେଇ ପଢି ବୋଲି ତୋତେ ସୋଷଣ କରୁଛନ୍ତୁଇ ନାଇ ଜାନୀ ବୋଲି ଦଲାଲ ତତେ ଠକୁଛେ.ତୁଇ ଗରୀବ ବିପିଏଲ୍ ବଲି ସରକାରୀ ବାବୁ ତୋତେ ଦେଖି ହସୁଛେ.ତୁଇ ସୋର୍ ନେଇ

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कुत्ता – वफ़ादार तो है!

छोटू लाल नागवंशी: वो करता रहा भौं-भौं, तेरे सोने पर जहां लगा था बिस्तर, दूसरे कोने पर हां, उसका प्रकृति है ही, भौंकने का चर

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