मंजिल की राहें

बाबूलाल बेसरा: ज़िंदगी एक सफर है,कठिन है राह, कम है समय, सामना कर मंजिल की ओर बढ़ना है,न कोई है मेरे साथ, अकेला हूँ मैं, आशाओं के

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ଜଲ ଜଂଗଲ ଜମୀନ୍ ଆମର ମାଁ ବୁଆ | जल, जंगल, ज़मीन हैं मां बाप हमारे

ଲୋଚନ ବରିହା (लोचन बरिहा): ଜଲ ଜଂଗଲ ଜମୀନ୍ ମାଁ ବୁଆ ରେ ଆମେ ଇ ମାଟିର ଛୁଆ ଜଂଗଲ ହେଉଛେ ଆମ୍ କେ ସାହାରେ ଆମେ ଇ ମାଟିର ଛୁଆ।।  ରାଜୁତି କାଲରେ

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आज मेरी प्यारी बहनों के लिये

उमेश्वर सिंह अर्मो: यह कविता लेखक ने रक्षाबंधन के समय लिखी थी आहत न होना बहन,मैं दिल की खोल रहा हूँ..!जय भीम मेरी बहन,मैं तेरा

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ମୋ ଜୀବନର ଆଦର୍ଶ (मेरे जीवन का आदर्श)

दयानंद बछा (ଦୟାନନ୍ଦ ବଛା): ଯଦିଓ ଆଜି ପଙ୍କରେ ଫୁଟିଥିବାପଦ୍ମ ଟିଏ ପରିନିଭୃତ ଅରଣ୍ୟର କଣ୍ଟାବୁଦାରେବଣ ମଲ୍ଲୀ ଟିଏ ଭଲିଫୁଟିଛି ଏଇ ଅଜ୍ଞାତ ବଣରେମହକାଇବି ଦିନେ ସାରା ଦୁନିଆକୁମୋର ସୁମଧୁର ବାସ୍ନାରେ….। ସରଳ ଜୀବନ

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