बूढ़ा किसान और उसकी लाचारी

एम.जे. वास्कले:

मेरे एक पड़ोसी हैं रामू, जो एक किसान हैं और अपनी पत्नी कमला के साथ रहते हैं। उन्हें मैं रामू काका और कमला काकी कहकर संबोधित करता हूं, रामू काका की उम्र लगभग 65 साल है। शरीर कमर के ऊपर से झुका हुआ है, जिस कारण उन्हें चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ता है। बिना चश्मे के उन्हें दिखाई नहीं देता है, फिर भी वह घर में नहीं बैठते हैं और हमेशा खेतों की रखवाली एवं काम करने चले जाते हैं। उनका एक लड़का है, वह शिक्षित है और किसानी का काम करने के काबिल भी है, परंतु वह बड़े शहर में पढ़ाई करने गया था तो उसने वहीं एक लड़की से शादी कर ली। उसकी पत्नी ने अपने बच्चों का भविष्य बनाने के नाम पर उसी शहर में रहने की शर्त रखी थी, जिसे निभाने के लिए रामू काका का लड़का भी बड़े शहर में रहता है और वहीं नौकरी करता हैं। 

रामू काका का लड़का उन्हें खेत में जाने से रोकता है क्योंकि खेत, शहर से 4 किलोमीटर दूर पहाड़ी इलाके में हैं, रास्ता ऊबड़ खाबड़ है, जगह-जगह पर गड्ढे हैं और एक नदी भी है जिस पर पुलिया तो है लेकिन वह पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है। खेतों के आस-पास जंगली जानवर का भी डर बना रहता है। फिर भी रामू काका मानते कहां हैं, रोज़ की तरह आज भी अपनी बैलगाड़ी से खेत में जाने के लिए सुबह से ही निकल गए थे। किंतु आज सुबह से ही भारी बारिश होने लगी थी जो कम होने का नाम नहीं ले रही थी, चारों तरफ आकाशीय बिजली चमक रही थी। शाम हो गई थी और अंधेरा छाने लगा था, लेकिन रामू काका अभी भी घर नही आए थे और उनका फोन भी बंद आ रहा था। 

कमला काकी बहुत चिंतित थी कि वह अभी तक क्यों नहीं आए हैं? वह मुझे बार-बार उन्हें लेने जाने के लिए कह रही थी। लेकिन भारी बारिश और बिजली की चमक से मुझे भी डर लग रहा था, फिर भी मैंने पड़ोस में ही रहने वाले एक दोस्त को तैयार किया और उन्हें खोजने के लिए निकल पड़ा। रात का समय था, ज़्यादा दूरी पर कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था। जैसे ही हम नदी तक पहुंचे तो देखे कि नदी का पानी पुलिया से ऊपर जा रहा है, थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद भी पुलिया के ऊपर से बह रहा पानी कम नहीं हो रहा था, क्योंकि बारिश और तेज़ हो गई थी। फिर हम वहां से वापस आए और दस किलोमीटर दूर बड़े पुल से घूमकर रामू काका के खेत में गए। वहां जाकर देखा तो लकड़ियों और घास-फूस से जो झोपड़ी बनी हुई थी, वह तेज़ हवा के कारण बिखर चुकी थी। 

वहीं पास में ही एक बड़ा सा पेड़ था जिसके नीचे रामू काका की बैलगाड़ी खड़ी थी और वहीं पर बैल भी बंधे हुए थे, किंतु रामू काका कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे जिस कारण हम घबरा गए। हमने आवाज़ लगाई फिर भी कोई जवाब नहीं मिला। लेकिन जो बैल बंधे हुए थे वो कुछ अलग हरकत कर रहे थे, वो बार-बार रंभाने लगे और रस्सी से छूटने का इशारा कर रहे थे, हमें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें। फिर हमने बैलों को छोड़ दिया तो दोनो बैल एकसाथ हमे उनकी तरफ आने का इशारा कर रहे थे। जब हम उनके पीछे गए तो देखा कि थोड़ी ही दूरी पर रामू काका कुछ सागौन के पत्तों के ऊपर बेसुध होकर पड़े थे। वो शायद उन पत्तों की छतरी बनाकर बैठे होंगे, परंतु काफी देर से चल रही ठंडी हवा और बारिश ने उन्हें बेसुध कर दिया होगा। 

बेसुध पड़े रामू काका ना तो कुछ कह पा रहे थे और ना ही उनके शरीर के अंग कार्य कर रहे थे, यह देखकर हमने बिना कोई देर किए कमला काकी और उनके लड़के को इसकी जानकारी फोन करके दी और उनको लेकर इलाज के लिए दवाखाने के लिए निकले। खेत से कुछ दूरी तक सड़क नहीं बनी थी और रामू काका चल भी नहीं सकते थे, बैलगाड़ी भी कीचड़ में फंस जा रही थी, फिर हम उन्हें खाट पर उठाकर पक्की सड़क तक लेकर गए और फिर वहां से उन्हें बैलगाड़ी में ले गए। तब तक रात के लगभग बारह बज गए थे तो डॉक्टर साहब भी सो गए थे, उन्हें जैसे-तैसे जगाया और इलाज शुरू करवाया। सुबह तक बारिश भी कम हो गई थी, तो कमला काकी और उनका लड़का भी दवाखाने में आ गए थे, रामू काका की हालत में भी अब सुधार आ गया था। वो बात करते-करते ही रोने लगे और कहने लगे इस उम्र किसको काम करने का शौक है, मेरी तो मजबूरी है इसलिए जाता हूं। तभी उनके लड़के ने उन्हें वचन दिया कि वो खेतों को संभालने के लिए वो नौकर रखेगा और सप्ताह में हर शनिवार और रविवार को वो ख़ुद घर आएगा और खेतों को भी संभालेगा, यह सुनकर रामू काका खुश हो गए।

फोटो आभार: पिक्साहाइव

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  • एम.जे. वास्कले, मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले से हैं। उन्होंने बी.एस.सी. और एमएसडब्ल्यू की पढ़ाई पूरी करी है। वर्तमान में वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।

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